मंगलवार, 1 फ़रवरी 2022

वसंत पंचमी



 वसंत पंचमी

हिन्दू कैलेंडर के अनुसार, माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को वसंत पंचमी  का पर्व मनाते हैं. इस  दिन  ही ज्ञान, वाणी और कला की देवी मां सरस्वती की पूजा की जाती है. उत्तर भारत में इस दिन को सरस्वती पूजा के नाम से भी जानते हैं. हिन्दू धर्म में सरस्वती पूजा के दिन बच्चों की शिक्षा प्रारंभ कराने या अक्षर ज्ञान शुरू कराने की परंपरा है. वसंत पंचमी के दिन सरस्वती पूजा क्यों होती है, इसके पीछे भी पौराणिक मान्यता है.

पौराणिक मान्यता है कि माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को ज्ञान और वाणी की देवी मां सरस्वती ब्रह्माजी के मुख से अवतरित हुई थीं. इस दिन को देवी सरस्वती की पूजा के लिए समर्पित कर दिया गया. इस वज​ह से हर साल वसंत पंचमी को सरस्वती पूजा का आयोजन किया जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, वसंत पंचमी को पूजा करने से मां सरस्वती जल्द ही प्रसन्न होती हैं.


वसंत पंचमी, बसंत पंचमी का अन्य भाषाओं में नाम

 

अंग्रेजी:    Vasant Panchami, Basant  Panchami  

हिंदी:    वसंत पंचमी, बसंत पंचमी

तेलुगु:    వసంత పంచమి

कन्नड़:    ವಸಂತ ಪಂಚಮಿ

गुजराती: વસંત પંચમી

बंगला:    বসন্ত পঞ্চমী

मराठी:    वसंत पंचमी


मान्यता है कि भगवान राम वसंत पंचमी के दिन माता शबरी के जूठे बेर खाये थे.


आइए जानते हैं कि इस वर्ष सरस्वती पूजा कब है? 


सरस्वती पूजा 2022 तिथि एवं मुहूर्त

पंचांग के अनुसार, माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि का प्रारंभ 05 फरवरी दिन शनिवार को प्रात: 03:47 बजे से हो रहा है. पंचमी तिथि अगले दिन 06 फरवरी दिन रविवार को प्रात: 03:46 बजे तक मान्य है. ऐसे में सरस्वती पूजा 05 फरवरी को मनाया जाएगा. वसंत पंचमी के दिन सरस्वती पूजा के लिए 5 घण्टे 28 मिनट का समय है. सरस्वती पूजा के लिए मुहूर्त 05 फरवरी को प्रात: 07:07 बजे से लेकर दोपहर 12:35 बजे तक है.


सिद्ध योग में सरस्वती पूजा

इस साल की सरस्वती पूजा सिद्ध योग में है. 05 फरवरी को ​सिद्ध योग शाम 05 बजकर 42 मिनट तक है, उसके बाद से साध्य योग शुरू हो जाएगा. इस दिन शुभ मुहूर्त दोपहर 12:13 बजे से दोपहर 12:57 बजे तक है. वसंत पंचमी के दिन रवि योग शाम 04:09 बजे से अगले दिन प्रात: 07:06 बजे तक है.


पूजन विधि


सरस्वती पूजन विधि आरंभ

सरस्वती माता के पूजन स्थल को गंगाजल पवित्र करें। सरस्वती माता की प्रतिमा अथवा तस्वीर को सामने रखकर उनके सामने धूप-दीप, अगरबत्ती, गुगुल जलाएं जिससे वातावरण में सकारात्मक उर्जा का संचार बढ़े। इसके बाद पूजा आरंभ करें।


1. पीले रंग के पुष्प- बसंत पंचमी के दिन पीले रंग का विशेष महत्व होता है। कहते हैं कि बसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती को पीले पुष्प अर्पित करना शुभ होता है। इससे वह प्रसन्न होती हैं और ज्ञान का वरदान देती हैं। इस दिन पीले रंग के वस्त्र पहनना भी उत्तम माना जाता है।

2. पूजा में शामिल करें ये चीजें- बसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती की पूजा में पेन, कॉपी, किताब आदि को शामिल करना चाहिए। कहते हैं कि इससे ज्ञान और बुद्धि के वरदान की प्राप्ति होती है।



आसन को मंत्र से शुद्ध करने का मंत्र


“ऊं अपवित्र: पवित्रोवा सर्वावस्थां गतोऽपिवा। य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तर: शुचि:॥” इन मंत्रों से अपने ऊपर तथा आसन पर 3-3 बार कुश या पीले फूल से छींटें लगाएं फिर आचमन मंत्र बोलते हुए आचमन करें – ऊं केशवाय नम:, ऊं माधवाय नम:, ऊं नारायणाय नम:, फिर हाथ धोएं, पुन: आसन शुद्धि मंत्र बोलें- ऊं पृथ्वी त्वयाधृता लोका देवि त्यवं विष्णुनाधृता। त्वं च धारयमां देवि पवित्रं कुरु चासनम्॥


माथे पर चंदन लगाएं। अनामिका उंगली से श्रीखंड चंदन लगाते हुए मंत्र बोलें ‘चन्दनस्य महत्पुण्यम् पवित्रं पापनाशनम्, आपदां हरते नित्यम् लक्ष्मी तिष्ठतु सर्वदा।’


बसंत पंचमी सरस्वती पूजन के लिए संकल्प मंत्र


हाथ में तिल, फूल, अक्षत मिठाई और फल लेकर ‘यथोपलब्धपूजनसामग्रीभिः माघ मासे बसंत पंचमी तिथौ भगवत्या: सरस्वत्या: पूजनमहं करिष्ये।’ इस मंत्र को बोलते हुए हाथ में रखी हुई सामग्री मां सरस्वती के सामने रखें। अब गणपति की पूजा करें।


बसंत पंचमी गणपति पूजन विधि


फूल लेकर गणपतिजी का ध्यान करें। मंत्र बोलें – गजाननम्भूतगणादिसेवितं कपित्थ जम्बू फलचारुभक्षणम्। उमासुतं शोक विनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपंकजम्। हाथ में अक्षत लेकर गणपति जी का आह्वान करें ‘ऊं गं गणपतये इहागच्छ इह तिष्ठ।। इतना कहकर पात्र में अक्षत रखें।


जल लेकर बोलें-


एतानि पाद्याद्याचमनीय-स्नानीयं, पुनराचमनीयम् ऊं गं गणपतये नम:। रक्त चंदन लगाएं: इदम रक्त चंदनम् लेपनम् ऊं गं गणपतये नम:, इसी प्रकार श्रीखंड चंदन बोलकर श्रीखंड चंदन लगाएं। इसके पश्चात सिन्दूर चढ़ाएं “इदं सिन्दूराभरणं लेपनम् ऊं गं गणपतये नम:। दूर्वा और विल्बपत्र गणेश जी को चढ़ाएं। गणेश जी को पीले वस्त्र चढ़ाएं। इदं पीत वस्त्रं ऊं गं गणपतये समर्पयामि।


गणपतिजी को प्रसाद अर्पित करने का मंत्र :


इदं नानाविधि नैवेद्यानि ऊं गं गणपतये समर्पयामि:। मिष्टान अर्पित करने के लिए मंत्र: इदं शर्करा घृत युक्त नैवेद्यं ऊं गं गणपतये समर्पयामि:।


प्रसाद अर्पित करने के बाद आचमन कराएं। इदं आचमनयं ऊं गं गणपतये नम:। इसके बाद पान सुपारी चढ़ाएं- इदं ताम्बूल पुगीफल समायुक्तं ऊं गं गणपतये समर्पयामि:। अब एक फूल लेकर गणपति पर चढ़ाएं और बोलें: एष: पुष्पान्जलि ऊं गं गणपतये नम:


गणपति पूजन की तरह सूर्य सहित नवग्रहों की पूजा करें। यहां अब गणेशजी के स्थान पर नवग्रहों के नाम लें।


सरस्वती पूजा कलश पूजन विधि :

घड़े या लोटे पर मोली बांधकर कलश के ऊपर आम का पल्लव रखें। कलश के अंदर सुपारी, दूर्वा, अक्षत, मुद्रा रखें। कलश के गले में मोली लपेटें। नारियल पर वस्त्र लपेट कर कलश पर रखें। हाथ में अक्षत और पुष्प लेकर वरुण देवता का कलश में आह्वान करें:- ओ३म् त्तत्वायामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदाशास्ते यजमानो हविभि:। अहेडमानो वरुणेह बोध्युरुशंस मान आयु: प्रमोषी:। (अस्मिन कलशे वरुणं सांगं सपरिवारं सायुध सशक्तिकमावाहयामि, ओ३म्भूर्भुव: स्व:भो वरुण इहागच्छ इहतिष्ठ। स्थापयामि पूजयामि॥)


इसके बाद जिस प्रकार गणेश जी की पूजा की है उसी तरह से वरुण और इन्द्रादि देवताओं की भी पूजा करें।


सरस्वती पूजन ध्यान मंत्र –


या कुन्देन्दु तुषारहार धवला या शुभ्रवस्त्रावृता।

या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।।


या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता।

सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा।।


शुक्लां ब्रह्मविचारसारपरमांद्यां जगद्व्यापनीं।

वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यांधकारपहाम्।।


हस्ते स्फाटिक मालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम्।

वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्।।


देवी सरस्वती की प्रतिष्ठा मंत्र


हाथ में अक्षत लेकर बोलें “ॐ भूर्भुवः स्वः सरस्वती देव्यै इहागच्छ इह तिष्ठ। इस मंत्र को बोलकर अक्षत छोड़ें। इसके बाद जल लेकर ‘एतानि पाद्याद्याचमनीय-स्नानीयं, पुनराचमनीयम्।” प्रतिष्ठा के बाद स्नान कराएं: ॐ मन्दाकिन्या समानीतैः, हेमाम्भोरुह-वासितैः स्नानं कुरुष्व देवेशि, सलिलं च सुगन्धिभिः।। ॐ श्री सरस्वतयै नमः।।


इदं रक्त चंदनम् लेपनम् से रक्त चंदन लगाएं। इदं सिन्दूराभरणं से सिन्दूर लगाएं। ‘ॐमन्दार-पारिजाताद्यैः, अनेकैः कुसुमैः शुभैः। पूजयामि शिवे, भक्तया, सरस्वतयै नमो नमः।। ॐ सरस्वतयै नमः, पुष्पाणि समर्पयामि।’ इस मंत्र से पुष्प चढ़ाएं फिर माला पहनाएं।


देवी सरस्वती को इदं पीत वस्त्रं समर्पयामि कहकर पीला वस्त्र पहनाएं। प्रसाद अर्पित करें “इदं नानाविधि नैवेद्यानि ऊं सरस्वतयै समर्पयामि” मंत्र से नैवैद्य अर्पित करें।


मिष्टान अर्पित करने के लिए मंत्र: “इदं शर्करा घृत समायुक्तं नैवेद्यं ऊं सरस्वतयै समर्पयामि” बालें। प्रसाद अर्पित करने के बाद आचमन कराएं। इदं आचमनयं ऊं सरस्वतयै नम:।


देवी सरस्वती को पान सुपारी भेंट करें : इदं ताम्बूल पुगीफल समायुक्तं ऊं सरस्वतयै समर्पयामि। अब एक फूल लेकर सरस्वती देवी पर चढ़ाएं और बोलें: एष: पुष्पान्जलि ऊं सरस्वतयै नम:। इसके बाद एक फूल लेकर उसमें चंदन और अक्षत लगाकर किताब कॉपी पर रखें।


मां सरस्वती की पूजा विधि-विधान से करने के बाद उन्हें पीले रंग की मिठाई का भोग लगाना चाहिए। ऐसे में मां सरस्वती को बेसन का लड्डू या बूंदी अर्पित की जा सकती है। मां सरस्वती को प्रसन्न करने के लिए खीर या मालपुए का भोग लगाया जा सकता है।


आरती की थाल सजाकर देवी सरस्वती की आरती करें। और प्रसाद वितरण करें।


आरती जय सरस्वती माता की


ॐ जय सरस्वती माता, जय जय सरस्वती माता।

सद्‍गुण वैभव शालिनी, त्रिभुवन विख्याता॥

चंद्रवदनि पद्मासिनी, ध्रुति मंगलकारी।

सोहें शुभ हंस सवारी, अतुल तेजधारी ॥ जय…..


बाएं कर में वीणा, दाएं कर में माला।

शीश मुकुट मणी सोहें, गल मोतियन माला ॥ जय…..


देवी शरण जो आएं, उनका उद्धार किया।

पैठी मंथरा दासी, रावण संहार किया ॥ जय…..

विद्या ज्ञान प्रदायिनी, ज्ञान प्रकाश भरो।

मोह, अज्ञान, तिमिर का जग से नाश करो ॥ जय…..


धूप, दीप, फल, मेवा मां स्वीकार करो।

ज्ञानचक्षु दे माता, जग निस्तार करो ॥ जय…..


मां सरस्वती की आरती जो कोई जन गावें।

हितकारी, सुखकारी, ज्ञान भक्ती पावें ॥ जय…..


जय सरस्वती माता, जय जय सरस्वती माता।

सद्‍गुण वैभव शालिनी, त्रिभुवन विख्याता॥ जय…..


ॐ जय सरस्वती माता, जय जय सरस्वती माता ।

सद्‍गुण वैभव शालिनी, त्रिभुवन विख्याता॥ जय…..


हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार , देवी का जन्म बसंत पंचमी को हुआ था, इसलिए हर साल लोग इस दिन उनकी पूजा करते हैं और उनका आशीर्वाद लेते हैं।

देवी की मिट्टी की मूर्तियाँ माथे पर अर्धचंद्र के साथ, हंस की सवारी करती हैं, या कमल के फूल पर विराजमान होती हैं, जिसे विभिन्न पूजा पंडाल में देखा जा सकता है।

पारंपरिक खिचड़ी (चावल और दाल का मिश्रण) पारंपरिक प्रसाद है जो सरस्वती पूजा पर सभी को दिया जाता है।

इस दिन केसर युक्त हलवा बना कर खानें की परम्परा है.


भक्त इस दिन को काफी शुभ मानते हैं और इसलिए वे अपनी-अपनी राशि के अनुसार देवता की पूजा करना पसंद करते हैं। ऐसे में हम लाए हैं आप कैसे अपनी राशि के अनुसार देवी की पूजा कर सकते हैं।


1.मेष

आप पारंपरिक रीति-रिवाजों और सरस्वती कवच ​​का पाठ करके देवी सरस्वती की पूजा कर सकते हैं। यह आपको देवी सरस्वती को प्रसन्न करने और ज्ञान और ज्ञान प्राप्त करने में मदद करेगा।

2. वृषभ

आपको देवी सरस्वती की पूजा करने और उन्हें पीले रंग के चावल के दाने चढ़ाने की आवश्यकता है। इस तरह आप अपने परिवार में सकारात्मक और आनंदमय वातावरण लाने में सक्षम होंगे।

3. मिथुन

जब आप सरस्वती की पूजा कर रहे हों, तो गायत्री मंत्र का जाप करें और देवी सरस्वती को फूल चढ़ाएं। यह आपके लिए सौभाग्य लेकर आएगा और कभी भी धन की कमी नहीं होगी

4. कर्क

देवी सरस्वती की पूजा करने के बाद, देवी सरस्वती को पीले और सफेद रंग के फूल चढ़ाएं। इस तरह आप देवी से ज्ञान और ज्ञान प्राप्त करेंगे।

5. सिंह

आपको खीर बनाने की जरूरत है और हो सके तो आप देवी सरस्वती को पीले रंग की मिठाई भी चढ़ा सकते हैं. चूंकि देवी सरस्वती को पीले और सफेद रंग का प्रसाद पसंद है, इसलिए वह आपके काम और व्यापार को आशीर्वाद देगी।

6. कन्या

वसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती को सफेद फूल चढ़ाएं। इन फूलों को चढ़ाने के बाद सरस्वती मंत्र का जाप करें और अपने प्रियजनों के लिए प्रार्थना करें।

7. तुला

आप पूजा के अनुष्ठानों का पालन करके देवी की पूजा कर सकते हैं और फिर उन्हें सफेद चंदन का लेप चढ़ा सकते हैं। इसके बाद उसी पेस्ट को अपने माथे पर तिलक की तरह लगाएं। ऐसा करने से आपको मां सरस्वती की कृपा प्राप्त होगी।

8. वृश्चिक

आप देवी सरस्वती की पूजा करते हुए सरस्वती मंत्र का जाप कर सकते हैं। एक बार पूजा करने के बाद, आप गरीब बच्चों के बीच अध्ययन सामग्री जैसे पेन, पेंसिल, किताबें आदि वितरित कर सकते हैं। इस तरह आपको सकारात्मक परिणाम और ज्ञान की प्राप्ति होगी।

9. धनु

आपको बसंत पंचमी के अवसर पर देवी सरस्वती के साथ भगवान गणेश की पूजा करने की आवश्यकता है। यह आपको ज्ञान प्राप्त करने और आपके ज्ञान को बढ़ाने में मदद करेगा।

10. मकर

वसंत पंचमी पर आपको 5 युवतियों को पीले वस्त्र और फूल चढ़ाने चाहिए। साथ ही, उनकी पूजा करें क्योंकि युवा लड़कियां देवी का प्रतीक हैं। इससे आपको सौभाग्य की प्राप्ति होगी और आप जो भी कार्य करेंगे उसमें आपको सफलता मिलेगी।

11. कुम्भ

देवी सरस्वती की पूजा करने के बाद, गरीबों और जरूरतमंदों को अनाज अर्पित करें। यह आपको नकारात्मक वाइब्स से बचाएगा और देवी आपको सफलता और ज्ञान का आशीर्वाद देंगी।

12. मीन

आप 108 चंदन की माला से जाते हुए सरस्वती मंत्र का जाप कर सकते हैं। ऐसा करने से आपके लिए सौभाग्य की प्राप्ति होगी और आपको ज्ञान की प्राप्ति होगी।



-निम्न मंत्र कमजोर विद्यार्थी या उनके अभिभावक भी मां सरस्वती के चित्र को सम्मुख रख के 5 या 11 माला कर सकते हैं।

ओम् ऐं सरस्वत्यै नमः


-वाक सिद्धि हेतु इस मंत्र जाप करें-

ओम हृीं ऐं हृीं ओम सरस्वत्यै नमः


- आत्म ज्ञान प्राप्ति के लिए

ओम् ऐं वाग्देव्यै विझहे धीमहि। तन्नो देवी प्रचोदयात्!!


- रोजगार प्राप्ति व प्रोमोशन के लिए

ओम् वद वद वाग्वादिनी स्वाहा


-परीक्षा में सफलता के लिए आज से ही इस मंत्र का जाप मां सरस्वती के चित्र के सम्मुख करते रहें।

ओम् एकदंत महा बुद्धि, सर्व सौभाग्य दायक:!

सर्व सिद्धि करो देव गौरी पुत्रों विनायकः !!



पंडित मदन मोहन मालवीय ने 1916 में बसंत पंचमी के दिन बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना किया.



भारत के विभिन्न राज्यों में बसंत पंचमी


पंजाब और हरियाणा

पंजाब और हरियाणा में ये त्योहार बहुत घूमधाम से मनाया जाता है. लोग सुबह जल्दी उठते हैं, स्नान करते हैं और पास के गुरुद्वारे या मंदिर में भगवान से आशीर्वाद लेने जाते हैं. त्योहार का आनंद लेने के लिए दोस्त, परिवार और पड़ोसी से मिलते हैं. बड़े और बच्चे सभी पतंग उड़ाते हैं. लोक गीत गाते और नृत्य करते हैं. इस दिन तैयार किए गए कुछ स्वादिष्ट व्यंजनों में मक्के की रोटी और सरसों का साग, खिचड़ी और मीठे चावल आदि शामिल हैं.


उत्तर प्रदेश और राजस्थान

इन राज्यों में देवी सरस्वती की पूजा की जाती. लोग पतंगबाजी प्रतियोगिता का हिस्सा बनते हैं. इस दिन सब पीले कपड़े पहनते हैं, मिठाइयां बांटते हैं और नृत्य करते हैं. उत्तर प्रदेश में कई भक्त बसंत पंचमी पर भगवान कृष्ण की पूजा करते हुए केसर चावल चढ़ाते हैं. इस दिन पीले गेंदे से घर और प्रवेश द्वार सजाए जाते हैं. राजस्थान में लोग चमेली की माला पहनते हैं.


पश्चिम बंगाल

दुर्गा पूजा के समान पश्चिम बंगाल के कई शहरों में देवी सरस्वती की मंत्रमुग्ध कर देने वाली मूर्ति के साथ एक पंडाल का निर्माण किया जाता है. लोग बड़ी संख्या में देवी मां की पूजा करने के लिए इकट्ठा होते हैं. मीठे पीले चावल और बूंदी के लड्डू चढ़ाते हैं. इस राज्य में कई समुदायों में त्योहार मनाने के लिए कम से कम 13 व्यंजन बनाने की रस्म होती है.


बिहार

बिहार में लोग सुबह जल्दी उठकर और देवी सरस्वती की पूजा करके अपने दिन की शुरुआत करते हैं. वे प्रार्थना के दौरान बूंदी के लड्डू और खीर चढ़ाते हैं और इन्हें परिवार के सदस्यों, पड़ोसियों और रिश्तेदारों के बीच बांटते हैं. कई समुदाय शाम को एक मैदान या पार्क में ढोल के साथ त्योहार मनाने के लिए इकट्ठा होते हैं. लोग नाचते हैं, गाते हैं और उत्सव का आनंद लेते हैं.


उत्तराखंड

बसंत पंचमी लोगों के लिए बहुत खुशी लेकर आता है. ये उत्तराखंड का एक महत्वपूर्ण त्योहार है. लोग यहां फूल, पत्ते और पलाश की लकड़ी चढ़ाकर देवी सरस्वती की पूजा करते हैं. कई भक्त भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा भी करते हैं. लोग पीले वस्त्र धारण करते हैं, माथे पर पीले रंग का तिलक लगाते हैं और पीले रुमाल का इस्तेमाल करते हैं. स्थानीय लोग उत्सव में नृत्य करते हैं, केसर हलवा तैयार करते हैं और पतंग उड़ाते हैं.



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मंगलवार, 11 जनवरी 2022

पोंगल



 पोंगल


जिस प्रकार ओणम् केरलवासियों का महत्त्वपूर्ण त्योहार है । उसी प्रकार पोंगल तमिलनाडु के लोगों का महत्त्वपूर्ण पर्व है । उत्तरभारत में जिन दिनों मकर सक्रान्ति का पर्व मनाया जाता है, उन्हीं दिनों दक्षिण भारत में पोंगल का त्यौहार मनाया जाता है।


पोंगल पर्व का संबंध  कृषि से है. इस पर्व को दक्षिण भारत में धूमधाम से मनाया जाता है. ये पर्व मकर संक्रांति के दिन यानि 14 जनवरी को मनाया जाता है. इस समय तक गन्ना और धान की फसल पक कर तैयार हो जाती है. पोंगल चार दिन तक चलने वाला तमिलनाडु का प्रमुख हिन्दू त्योहार है. पोंगल के इस त्योहार पर 4 दिनों तक उत्सव का माहौल  रहता है. यहां के लोग इस पर्व को नए साल के रूप में मनाते हैं. यह त्योहार तमिल महीने ‘तइ’ की पहली तारीख से शुरू होता है. इस त्योहार में इंद्र देव और सूर्य की उपासना की जाती है. पोंगल का त्योहार संपन्नता को समर्पित है. पोंगल में समृद्धि के लिए वर्षा, धूप और कृषि से संबंधित चीजों की पूजा अर्चना की जाती है. आइए जानते हैं इस पर्व का महत्व और शुभ मुहूर्त.


पोंगल शुभ मुहूर्त


चार दिन तक चलने वाले इस पर्व की शुरुआत 14 जनवरी से हो रही है. ज्योतिषाचार्य के अनुसार पोंगल पर पूजा के लिए इस दिन दोपहर 2 बजकर 12 मिनट का शुभ मुहूर्त है.


ध्यान रखें कि ये नई दिल्ली, भारत के लिए समय हैं,


कैसे मनाया जाता है पोंगल? 


पोंगल के त्योहार पर मुख्य तौर पर सूर्य की पूजा की जाती है. सूर्य को जो प्रसाद अर्पित किया जाता है, उसे पगल कहते हैं. पोंगल के पहले दिन लोग सुबह उठकर स्नान करके नए कपड़े पहनते हैं और नए बर्तन में दूध, चावल, काजू, गुड़ आदि चीजों की मदद से पोंगल नाम का भोजन बनाया जाता है. इस दिन गायों और बैलों की भी पूजा की जाती है. किसान इस दिन अपनी बैलों को स्नान कराकर उन्हें सजाते हैं. इस दिन घर में मौजूद खराब वस्तुओं और चीजों को भी जलाया जाता है और नई वस्तुओं को घर लाया जाता है. कई लोग पोंगल के पर्व से पहले अपने घरों को खासतौर पर सजाते हैं.


पोंगल का त्योहार तमिलनाडु में पूरे उत्साह और जोश के साथ मनाया जाता है. 4 दिनों तक चलने वाले इस त्योहार के पहले दिन को ‘भोगी पोंगल’ कहते हैं, दूसरे दिन को ‘सूर्य पोंगल’, तीसरे दिन को ‘मट्टू पोंगल’ और चौथे दिन को ‘कन्नम पोंगल’ कहते हैं. पोंगल के हर दिन अलग-अलग परंपराओं और रीति रिवाजों का पालन किया जाता है.


भारत एक कृषि प्रधान देश है । यहाँ की अधिकांश जनता कृषि के द्वारा आजीविका अर्जित करती है । आजकल तो उद्योगिकरण के साथ-साथ कृषि कार्य भी मशीनों से किया जाने लगा है । परन्तु पहले कृषि मुख्यत: बैलों पर आधारित थी । बैल और गाय इसी कारण हमारी संस्कृति में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं ।


भगवान शिव का वाहन यदि बैल है तो भगवान श्रीकृष्ण गोपालक के नाम से जाने जाते हैं । गायों की हमारे देश में माता के समान पूज्य मानकर सेवा की जाती रही है । गाय केवल दूध ही नहीं देती बल्कि वो हमें बछड़े प्रदान करती है जो खेती करने के काम आते हैं । तमिलनाडुवासी तो पोंगल के अवसर पर विशेष रूप से गाय, बैलों की पूजा करते हैं ।


महिलाएं भगवान से अच्छी फसल होने की प्रार्थना करती है । इन्हीं दिनों घरों की लिपाई-पुताई प्रारम्भ हो जाती है । अमावस्या के दिन सब लोग एक स्थान पर एकत्र होते हैं । इस अवसर पर लोग अपनी समस्याओं का समाधान खोजते हैं । अपनी रीति-नीतियों पर विचार करते हैं और जो अनुपयोगी रीति-नीतियाँ हैं उनका परित्याग करने की प्रतिज्ञा की जाती है ।


जिस प्रकार 31 दिसम्बर की रात को गत वर्ष को संघर्ष और बुराइयों का साल मानकर विदा किया जाता है, उसी प्रकार पोंगल को भी प्रतिपदा के दिन तमिलनाडुवासी बुरी रीतियों को छोड़ने की प्रतिज्ञा करते हैं ।


यह कार्य ‘पोही’ कहलाता है । जिसका अर्थ है- ‘जाने वाली’ । इसके द्वारा वे लोग बुरी चीजों का त्याग करते हैं और अच्छी चीजों को ग्रहण करने की प्रतिज्ञा करते हैं।


पोही के अगले दिन अर्थात् प्रतिपदा को पोंगल की धूम मच जाती है । इस अवसर पर सभी छोटे-बड़े लोग काम में आने वाली नई चीजे खरीदते हैं और पुरानी चीजों को बदल डालते हैं । नए वस्त्र और नए बर्तन खरीदे जाते हैं।


नए बर्तनों में दूध उबाला जाता है । खीर बनाई जाती है। लोग पकवानों को लेकर इकट्‌ठे होते हैं, और सूर्य भगवान की पूजा करते हैं। मकर सक्रान्ति से सूर्य उत्तरायण में चला जाता है दिन बड़े होने लगते हैं । सूर्य भगवान की कृपा होने पर ही फसलें पकती हैं । किसानों को उनकी वर्ष भर की मेहनत फल मिलता है ।


ये त्योहार तामिलनाडु का त्योहार अवश्य है पर इसके पीछे जो आध्यात्मिक संदेश छिपा है वह सम्पूर्ण भारतवासियों के लिए पवित्रता और नवोत्साह का संदेश देता है । इस त्योहार पर गाय के दूध के उफान को बहुत महत्व दिया जाता है ।


उनका विचार है कि जिस प्रकार दूध का उफान शुद्ध और शुभ है उसी प्रकार प्रत्येक प्राणी का मन भी शुद्ध संस्कारों से उज्ज्वल होना चाहिए । इसलिए वे अन्त:करण की शुद्धता के लिए सूर्यदेव से प्रार्थना करते हैं.

इस त्यौहार का नाम पोंगल इसलिए पड़ा, क्योंकि इस दिन सूर्य देव को जो प्रसाद अर्पित किया जाता है वह पगल कहलाता है. तमिल भाषा में पोंगल का एक अन्य अर्थ निकलता है अच्छी तरह उबालना’. दोनों ही रूप में देखा जाए तो बात निकल कर यह आती है कि अच्छी तरह उबाल कर सूर्य देवता को प्रसाद भोग लगाना. पोंगल का महत्व इसलिए भी है क्योंकि यह तमिल महीने की पहली तारीख को आरम्भ होता है.


पोंगल पर्व से ही तमिलनाडु में नव वर्ष का शुभारंभ होता है. पोंगल की तुलना नवान्न से की जा सकती है जो फसल की कटाई का उत्सव होता है. पोंगल का तमिल में अर्थ उफान या विप्लव होता है. यह त्‍योहार पारंपरिक रूप से संपन्‍नता को समर्पित है, जिसमें समृद्धि लाने के लिए वर्षा, धूप और खेतिहर मवेशियों की आराधना की जाती है. 


इस त्‍योहार का इतिहास एक हजार साल पुराना है और इसे तमिळनाडु सहित देश के अन्य भागों के अलावा श्रीलंका, मलेशिया, मॉरिशस, अमेरिका, कनाडा, सिंगापुर और अन्य कई स्थानों पर रहने वाले तमिलों द्वारा उत्साह से मनाया जाता है. तमिलनाडु के प्रायः सभी सरकारी संस्थानों में इस दिन अवकाश रहता है. 


15/14 जनवरी का दिन उत्तर भारत में मकर संक्रान्ति के नाम से मनाया जाता है जिसका महत्व सूर्य के मकर रेखा की तरफ़ प्रस्थान करने को लेकर है.


इसे गुजरात और महाराष्ट्र में उत्तरायन कहते हैं, 


जबकि यही दिन आन्ध्र प्रदेश, केरल और कर्नाटक (ये तीनों राज्य तमिलनाडु से जुड़े हैं) में संक्रान्ति के नाम से मनाया जाता है. 


पंजाब में इसे लोहड़ी के नाम से मनाया जाता है. 


दक्षिण भारत के तमिलनाडु राज्य में पोंगल का त्यौहार सूर्य के मकर राशि में प्रवेश का स्वागत कुछ अलग ही अंदाज में किया जाता है. सूर्य को अन्न धन का दाता मानकर चार दिनों तक यह उत्सव मानाया जाता है.


चार दिनों तक चलता है पोंगल


पोंगल के महत्व का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि यह पर्व चार दिनों तक चलता है. हर दिन के पोंगल का अलग-अलग नाम होता है. यह जनवरी से शुरू होता है.


1. भोगी पोंगल


पहली पोंगल को भोगी पोंगल कहते हैं जो देवराज इन्द्र का समर्पित हैं. इसे भोगी पोंगल इसलिए कहते हैं क्योंकि देवराज इन्द्र भोग विलास में मस्त रहनेवाले देवता माने जाते हैं. इस दिन संध्या समय में लोग अपने अपने घर से पुराने वस्त्र कूड़े आदि से लाकर एक जगह इकट्ठा करते हैं और उसे जलाते हैं. यह ईश्वर के प्रति सम्मान एवं बुराईयों के अंत की भावना को दर्शाता है. इस अग्नि के इर्द गिर्द युवा रात भर भोगी कोट्टम बजाते हैं जो भैस की सिंग काबना एक प्रकार का ढ़ोल होता है.


2. सूर्य पोंगल


दूसरी पोंगल को सूर्य पोंगल कहते हैं. यह भगवान सूर्य को निवेदित होता है. इसदिन पोंगल नामक एक विशेष प्रकार की खीर बनाई जाती है जो मिट्टी के बर्तन में नये धान से तैयार चावल मूंग दाल और गुड़ से बनती है. पोंगल तैयार होने के बाद सूर्य देव की विशेष पूजा की जाती है और उन्हें प्रसाद रूप में यह पोंगल व गन्ना अर्पण किया जाता है.


3. मट्टू पोंगल


तीसरे पोंगल को मट्टू पोंगल कहा जाता है. तमिल मान्यताओं के अनुसार मट्टू भगवान शंकर का बैल है जिसे एक भूल के कारण भगवान शंकर ने पृथ्वी पर रहकर मानव के लिए अन्न पैदा करने के लिए कहा और तब से पृथ्वी पर रहकर कृषि कार्य में मानव की सहायता कर रहा है. इस दिन किसान अपने बैलों को स्नान कराते हैं. उनके सिंगों में तेल लगाते हैं एवं अन्य प्रकार से बैलों को सजाते है. बालों को सजाने के बाद उनकी पूजा की जाती है. बैल के साथ ही इस दिन गाय और बछड़ों की भी पूजा की जाती है. 


कही-कहीं लोग इसे केनू पोंगल के नाम से भी जानते हैं, जिसमें बहनें अपने भाईयों की खुशहाली के लिए पूजा करती है और भाई अपनी बहनों को उपहार देते हैं.


4. कन्नम पोंगल /कन्या पोंगल


चार दिनों के इस त्यौहार के अंतिम दिन कन्या पोंगल मनाया जाता है, जिसे तिरूवल्लूर के नाम से भी लोग पुकारते हैं. इस दिन घर को सजाया जाता है. आम के पलल्व और नारियल के पत्ते से दरवाजे पर तोरण बनाया जाता है. महिलाएं इस दिन घर के मुख्य द्वारा पर कोलम यानी रंगोली बनाती हैं. इस दिन पोंगल बहुत ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है. लोग नये वस्त्र पहनते है और दूसरे के यहां पोंगल और मिठाई वयना के तौर पर भेजते हैं. इस पोंगल के दिन ही बैलों की लड़ाई होती है जो काफी प्रसिद्ध है. रात्रि के समय लोग सामुदिक भोज का आयोजन करते हैं और एक दूसरे को मंगलमय वर्ष की शुभकामना देते हैं.


पोंगल पौराणिक कथाए

जिस प्रकार हर त्यौहार के पीछे कुछ पौराणिक कथाए जुडी है वैसे ही पोंगल के पीछे भी कुछ कथाए जुडी है |


एक कथा के अनुसार एक बार भगवान शंकर ने अपने बैल को ये आदेश दिया कि पृथ्वी लोक पर जाकर सभी प्राणी को ये सन्देश दो कि उसे हर दिन तेल में स्नान करना है और महीने में एक बार खाना खाना है |


लेकिन उस बैल ने पृथ्वी लोक पर जाकर सभी से उल्टा ही बोल दिया | उसने ये कहा कि आपको महीने में एक दिन तेल से स्नान करना है और हर रोज खाना खाना है| यह बात सुनकर भगवान शंकर बहुत क्रोधित हो गए | और कहा आपने ये क्या किया | अगर वो हर दिन खाना खाएंगे तो उतना भोजन कहाँ से आएगा | अब अगर आपने गलती किया है तो आपको ही भुगतना पड़ेगा |


और भगवान शंकर ने उस बैल को कहाँ आप जाओ पृथ्वी लोक पर और मनुष्य जाती को अनाज उत्पादन में मदद करो | अब बैल से हल जोतकर किसान अपने फसल का उत्पादन करता है |


एक दूसरी कथा के अनुसार जब भगवान श्री कृष्णा बचपन में थे, तो उन्होंने इंद्र भगवान को सबक सिखाना चाहा | उन्होंने अपने गोकुल वासियो को भगवान इंद्र की पूजा करने से मना कर दिया | जिससे इंद्र भगवान बहुत नाराज हो गए और उन्होंने बहुत मूसलाधार बारिश करवा दी जिससे सारा गोकुल नगर डूब गया|


फिर भगवान कृष्णा ने गोवर्धन पर्वत को अपने अंगुली से उठाकर गोकुलवासियों की रक्षा की | और इंद्र के घमंड को चूर किया |


Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. लेखक इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.


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रविवार, 9 जनवरी 2022

मकर संक्रांति, खिचड़ी संक्रांति

 


मकर संक्रांति, 

मकर संक्रांति मुहूर्त 2022

14 जनवरी पुण्य काल मुहूर्त : 2 बजकर 12 मिनट से शाम 5 बजकर 45 मिनट तक

महापुण्य काल मुहूर्त : 2 बजकर 12 मिनट से 2 बजकर 36 मिनट तक  (अवधि कुल 24 मिनट)

ध्यान रखें कि ये नई दिल्ली, भारत के लिए समय हैं,


मकर संक्रांति हिन्दुओं का प्रमुख पर्व माना जाता है. पौष मास में इस दिन सूर्य उत्तरायण होता है और मकर राशि में प्रवेश करता है. मकर संक्रांति से ही ऋतु परिवर्तन भी होने लगता है. इस दिन स्नान और दान-पुण्य जैसे कार्यों का विशेष महत्व माना गया है.

हिंदू धर्म में नवग्रहों को भी देव का दर्जा दिया गया है। जिनमें से सूर्य देव को सभी का राजा कहा जाता है। तो वहीं शास्त्रों में सूर्य भगवान को संपूर्ण जगत की आत्मा कहकर संबोधित किया जाता है। ऋग्वेद के देवताओं के सूर्य का महत्वपूर्ण स्थान है। इसके अलावा भारतीय ज्योतिष में सूर्य ग्रह को आत्मा का कारक माना जाता है।  उत्तराषाढ़ा, उत्तराफ़ाल्गुनी तथा कृतिका सूर्य से संबंधित नक्षत्र माने जाते हैं। यह भचक्र की पांचवीं राशि सिंह के स्वामी हैं। अब इन सब बातों से आप जान चुके होंगे कि सूर्य देव हिंदू धर्म के कितने प्रमुख देवताओं में शामिल हैं, और इसमें इनका कितना महत्व है। 

मकर संक्रांति का महत्व

भारतीय संस्कृति में सूर्य का बड़ा महत्व है | सूर्य हमारे वैदिक देवता हैं | सूर्यदेव के बारे में वेद में कहा गया हे "सूर्य आत्मा जगत:" अर्थात सूर्य विश्व का आत्मा है | ज्योतिष शास्त्र में सूर्य को आत्मा का कारक माना गया है| मेष आदि १२ राशियाँ है | हर राशि में सूर्य एक माह तक रहते हैं | जब सभी १२ राशियों का परिभ्रमण समाप्त होता है तब एक संवत्सर यानी वर्ष समाप्त होता है| काल गणना का विस्तृत विज्ञानं हमारे भारतीय ग्रंथो में वर्णित है |जिसके अनुसार अहोरात्र का एक दिन, सात दिन का सप्ताह,दो सप्ताह का एक पक्ष, शुक्ल और कृष्ण इन दो पक्षों का एक मास, दो मास की एक ऋतु,तीन ऋतुओ का एक अयन और दो आयनो का एक वर्ष होता है | जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं तब से ६ महीने उत्तरायण के महीने होते हैं | जब सूर्य कर्क राशि में प्रवेश करते हैं तब से ६ महीने दक्षिणायन|

उत्तरायण का वैशिष्ट्य

उत्तरायण के समय में दिन बड़े, आकाश स्वच्छ और सूर्य की किरणे स्पष्ट,तीव्र एवं सीधी होती हैं | प्रकृति के विकास के लिए यह समय उत्कृष्ट समय माना गया है |मकर संक्रांति से सर्दी में कमी आने लगती है यानि शरद ऋतु के जाने का समय आरंभ हो जाता है और बसंत ऋतु का आगमन शुरू हो जाता है. मकर संक्रांति के बाद ही दिन लंबे रातें छोटी होने लगती हैं इसी समय में ऋतुओं के राजा वसंत का आगमन होता है | अतः उत्तरायण का काल शुभ माना जाता है|" उत्तरम् अयनम् अतीत्य व्यावृत्तः क्षेम सस्य वृद्धिकरः |" उत्तरायण का सूर्य क्षेम एवं धान्य वृद्धि करानेवाला होता है |

मकर संक्रांति को क्या करना चाहिए

 मकर संक्रांति के दिन वस्त्र,अन्न,बर्तन,तिल,घी,गुड,सुवर्ण,घोड़े,गाय या गौचारे का दान करनाचाहिए |हो सके अधिक  से अधिक समय जप अनुष्ठान करना चाहिए | यज्ञ करना अति श्रेष्ठ पर्याय है | अच्छे विचार करना और लोगो से अच्छा व्यव्हार करना तथा पुरे वर्ष के लिए किसी अच्छी प्रवृत्ति या नियम का संकल्प लेना | शास्त्र अभ्यास या गुरु से ज्ञान प्राप्त करने की शुरुआत करना |

मकर संक्रांति और महाभारत काल…

महाभारत युद्ध के महान योद्धा और कौरवों की सेना के सेनापति गंगापुत्र भीष्म पितामह को इच्छा मुत्यु का वरदान प्राप्त था। भीष्म जानते थे कि सूर्य दक्षिणायन होने पर व्यक्ति को मोक्ष प्राप्त नहीं होता और उसे इस मृत्युलोक में पुनः जन्म लेना पड़ता है। अर्जुन के बाण लगाने के बाद उन्होंने इस दिन की महत्ता को जानते हुए अपनी मृत्यु के लिए इस दिन को निर्धारित किया था। महाभारत युद्ध के बाद जब सूर्य उत्तरायण हुआ तभी भीष्म पितामह ने प्राण त्याग दिए।

हर बारह साल में, हिंदू कुंभ मेले के साथ मकर संक्रांति मनाते हैं- दुनिया की सबसे बड़ी सामूहिक तीर्थयात्रा में से एक, इस आयोजन में अनुमानित 40 से 100 मिलियन लोग शामिल होते हैं। इस आयोजन में, वे सूर्य से प्रार्थना करते हैं और गंगा नदी और यमुना नदी के प्रयाग संगम पर स्नान करते हैं. यह परंपरा आदि शंकराचार्य ने प्रारंभ की थी। 

जुड़ी हुई हैं कई पौराणिक कथाएं

मकर संक्रांति के साथ अनेक पौराणिक कथाएं जुड़ी हुई हैं जिसमें से कुछ के अनुसार भगवान आशुतोष ने इस दिन भगवान विष्णु जी को आत्मज्ञान का दान दिया था।

ऐसी है मान्यता…

भगवान विष्णु की असुरों पर जीत

इस दिन लाखों श्रद्धालु गंगा और पावन नदियों में स्नान कर दान करते हैं. मकर संक्रांति के दिन भगवान विष्णु ने पृथ्वी लोक पर असुरों का वध कर उनके सिरों को काटकर मंदरा पर्वत पर गाड़ दिया था. तभी से भगवान विष्णु की इस जीत को मकर संक्रांति पर्व के रूप में मनाया जाता है

शनि से सूर्य के मिलन की कथा

देवी पुराण में बताया गया है कि सूर्य देव जब पहली बार अपने पुत्र शनि देव से मिलने गए थे, तक शनि देव ने उनको काला तिल भेंट किया था. उससे ही उनकी पूजा की थी. इससे सूर्य देव अत्यंत प्रसन्न हुए थे. फलस्वरूप शनि देव को आशीष दिया कि जब वे उनके घर मकर राशि में आएंगे, तो उनका घर धन-धान्य से भर जाएगा. मकर सं​क्रांति के अवसर पर जब सूर्य का शनि के घर में आगमन हुआ, तो उनका घर धन-धान्य से भर गया.

मकर संक्रांति और गंगा सागर

मान्यता है कि संक्रांति के दिन ही मां गंगा स्वर्ग से अवतरित होकर राजा भागीरथ के पीछे-पीछे कपिल मुनि के आश्रम से होती हुई गंगासागर तक पहुँची थी। धरती पर अवतरित होने के बाद राजा भागीरथ ने गंगा के पावन जल से अपने पूर्वजों का तर्पण किया था। इस दिन पर गंगा सागर पर नदी के किनारे भव्य मेले का आयोजन किया जाता हैं।

श्रीकृष्ण का ये प्रसंग

माना जाता है कि भगवान श्री कृष्ण ने कहा था कि जो मनुष्य इस दिन अपने देह को त्याग देता है उसे मोक्ष की प्राप्ती होती है.

स्नान-दान का है पर्व

उत्तर प्रदेश में यह मुख्य रूप से ‘दान का पर्व’ माना जाता है। माघ मेले में स्नान के लिए ये सबसे शुभ दिन माना गया है। इस दिन गंगा स्नान करके तिल के मिष्ठान आदि को ब्राह्मणों में दान दिया जाता है।

इसलिए कहा जाता है देवायन

मकर संक्रांति के दिन देवलोक में भी दिन का आरंभ होता है। इसलिए इसे देवायन भी कहा जाता है।माना जाता है कि इस दिन देवलोक के दरवाजे खुल जाते हैं। हिंदू मान्यताओं के अनुसार इस दिन से खरमास (पौष माह) के समाप्त होने के कारण रुके हुए शुभ कार्य जैसे कि विवाह, मुंडन, गृह निर्माण आदि मंगल कार्य पुन: शुरू हो जाते हैं।

शनि दोष से मुक्ति मिलती है 

 मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव का पुत्र शनि देव से मिलन होता है. धनु राशि से निकलकर सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते हैं. मकर राशि के स्वामी शनि देव हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मकर संक्रांति को सूर्य देव अपने पुत्र शनि देव से मिलने उनके घर जाते हैं. जो लोग मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव की आराधना करते हैं, उनको शनि दोष से मुक्ति मिलती है और उनका घर धन-धान्य से भर जाता है. ऐसी मान्यता है कि सूर्य की चमक के आगे शनि देव तेजहीन हो जाते हैं, इसलिए इस दिन शनि का प्रभाव कम हो जाता है. सूर्य देव के शनि देव से मिलने की कथा देवी पुराण में बताई गई है. आइए जानते हैं उस कथा के बारे में और उन उपायों के बारे में जिनसे आप धन-धान्य प्राप्त कर सकते हैं.

धन-धान्य के लिए मंकर संक्रांति पर उपाय

1. मकर संक्रांति के दिन यदि आप काले तिल से सूर्य देव और शनि देव की पूजा करें, तो आप पर दोनों की कृपा होगी. आप पर शनि दोष कम होगा या शनि के दुष्प्रभाव में कमी आएगी. सुख समृद्धि बढ़ेगी.

2. मकर संक्रांति के अवसर पर आप यदि काले तिल से सूर्य देव की पूजा करें, तो आपका भी घर धन-धान्य से भर जाएगा, जिस प्रकार से शनि देव का घर भर गया था. इस दिन आपको स्नान के बाद साफ कपड़ा पहनना चाहिए.

उसके बाद तांबे के लोटे में पानी भर लें, उसमें काला तिल, अक्षत्, फूल और लाल चंदन डाल दें. फिर सूर्य मंत्र का जाप करते हुए उस जल को सूर्य देव को अर्पित कर दें. ऐसा करने से सूर्य देव प्रसन्न होंगे और आपको सुख, सौभाग्य का आशीर्वाद मिलेगा.

क्यों उड़ाते हैं इस दिन पतंग

माना जाता है कि सूर्य के मकर राशि में जाते ही शुभ समय की शुरुआत हो जाती है। इसलिए लोग शुभता की शुरुआत का जश्न मनाने के लिए पतंग उड़ाते हैं। इस दिन आसमान में रंग बिरंगी पतंगे लहराती हुई नजर आती हैं। कई जगहों पर पतंग उड़ाने की प्रतियोगताएं भी आयोजित की जाती हैl 

विभिन्न राज्यों में मकर संक्रांति

मकर संक्रांति के विभिन्न नाम जिनसे इसे देश के विभिन्न भागों में जाना जाता है, इस प्रकार हैं। वैसे तो इस त्योहार को अलग-अलग नामों से मनाया जाता है, लेकिन इस दिन के उत्सव और उत्सव एक-दूसरे से काफी मिलते-जुलते हैं।

असम- माघ बिहु

पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश- माघी  

मध्य भारत- सुकराती

तमिलनाडु- थाई पोंगल

गुजरात, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश- उत्तरायण

उत्तराखंड- घुघुती

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना- संक्रांति

ओडिशा, कर्नाटक, महाराष्ट्र, गोवा, पश्चिम बंगाल- मकर संक्रांति

उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश- खिचड़ी संक्रांति

पश्चिम बंगाल- पौष संक्रांति

कश्मीर- शिशूर संक्रांति

त्रिपुरा- हंगराइ

इस दिन, तमिल किसान और तमिल लोग सूर्य देव सूर्य नारायणन का सम्मान करते हैं । ऐसा तब होता है जब सूर्य मकर राशि (मकर) में प्रवेश करता है । थाई पोंगल त्योहार जनवरी के मध्य, या में मनाया जाता है.थाई पोंगल त्योहार धान की फसल के कटाई के समय मनाया जाता है.

न केवल भारत, बल्कि यह दिन अन्य देशों के लोगों द्वारा भी मनाया जाता है। दक्षिण एशियाई देश जैसे नेपाल (माघी संक्रांति), पाकिस्तान (तिर्मूरी), सिंगापुर और मलेशिया (उझावर थिरुनल), सोंगक्रान (थाईलैंड), कंबोडिया (मोहन सोंगक्रान) आदि मकर संक्रांति पर्व भी मनाते हैं।

बांग्लादेश   

शकरेन बांग्लादेश में सर्दियों का एक वार्षिक उत्सव है , जिसे पतंग उड़ाने के साथ मनाया जाता है । 

नेपाल

माघे संक्रांति (नेपाली: माघे संक्रांति, मथिली: माघी, नेपाल भाषा: घ्यःचाकुल संक्रांति) एक नेपाली त्योहार है जो विक्रम संबत (बीएस) कैलेंडर (लगभग 14 जनवरी) में माघ के पहले दिन मनाया जाता है । थारू लोग इस खास दिन को नए साल के रूप में मनाते हैं। इसे मागर समुदाय का प्रमुख सरकार घोषित वार्षिक उत्सव भी माना जाता है । 

इस त्योहार के दौरान हिंदू स्नान करते हैं। इनमें पाटन के पास बागमती के पास शंखमूल; त्रिवेणी, पर गंडकी / नारायणी नदी बेसिन में देवघाट के पास चितवन घाटी और रिडी के पास कालीगंडकी पर; और  कोशी नदी बेसिन में दोलाल के सूर्य कोशी । 

लड्डू, घी और शकरकंद वितरित किए जाते हैं। हर घर की मां परिवार के सभी सदस्यों के अच्छे स्वास्थ्य की कामना करती है। 

पाकिस्तान (सिंध)   

इस त्यौहार के दिन सिंधी माता-पिता अपनी विवाहित बेटियों को तिल के लड्डू और चिकी भेजते हैं। भारत में सिंधी समुदाय भी मकर संक्रांति को तिर्मूरी के रूप में मनाते हैं जिसमें माता-पिता अपनी बेटियों को मीठे व्यंजन भेजते हैं। 

खिचड़ी संक्रांति

भारत के विभिन्न क्षेत्रों में मकर संक्रांति के दिन चावल की खिचड़ी खाने की परम्परा है.

बाबा गोरखनाथ का दिया हुआ नाम है 'खिचड़ी'

ऐसी मान्यता है कि मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी बनाने की प्रथा बाबा गोरखनाथ के समय से ही शुरू हो गई थी। देश में जब खिलजी ने आक्रमण किया तो नाथ योगियों को युद्ध के दौरान भोजन तैयार करने का समय नहीं मिलता था और वे भूखे-प्यासे युद्ध के लिए निकल जाते थे। उस समय बाबा गोरखनाथ ने दाल, चावल और सब्जियां एक साथ पकाने की सलाह दी थी। यह खाना जल्दी तैयार हो जाता था और योगियों का पेट भी भर जाता था और साथ में काफी पौष्टिक भी होता था।

तत्काल तैयार किए जाने वाले इस व्यंजन का नाम खिचड़ी बाबा गोरखनाथ ने रखा था। खिलजी से मुक्त होने के बाद योगियों ने जब मकर संक्रांति पर्व मनाया था तो उस दिन सभी को खिचड़ी का ही वितरण किया गया था। तभी से मकर संक्रांति पर खिचड़ी बनाने की प्रथा शुरू हो गई। गोरखपुर में स्थित बाबा गोरखनाथ मंदिर में मकर संक्रांति के अवसर पर खिचड़ी मेले का आयोजन हर साल होता है और प्रसाद के रूप में खिचड़ी ही बांटी जाती है। श्रधालु मंदिर में चावल एवं उड़द की दाल दान देते हैं.

खिचड़ी का धार्मिक महत्व

मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव अपने पुत्र शनि के घर मिलने जाते हैं। ज्योतिष में उड़द की दाल को शनि से संबंधित माना गया है। ऐसे में उड़द की दाल की खिचड़ी खाने से शनि देव और सूर्यदेव दोनों प्रसन्न होते हैं। चावल को चंद्रमा, शुक्र को नमक, बृहस्पति को हल्दी, बुध को हरी सब्जी का कारक माना गया है। वहीं खिचड़ी की गर्मी से इसका संबंध मंगल से है। मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी खाने से कुंडली में लगभग सभी ग्रहों की स्थिति में सुधार होता है।

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